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मैं, मुझमें कहीं

मैं, मुझमें कहीं

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मैं, मुझमें कहीं — शब्दों के रास्ते, खुद तक का सफ़र यह किताब कोई कहानी नहीं, एक सफ़र है — उस इंसान तक पहुँचने का, जो हर किसी के भीतर कहीं खोया-खोया-सा रहता है। इसमें शामिल हर कविता उन ख़ामोश रातों की गवाह है, जब आँसू शब्द बनकर काग़ज़ पर उतर आए, और दर्द ने ख़ुद को कविता में ढाल लिया। कभी टूटने की पीड़ा है, तो कभी फिर से उठ खड़े होने का हौसला। कभी अडिगता है, तो कभी वो सुकून, जो किसी अपने के साथ से मिलता है। ये कविताएँ धरती की पुकार सुनती हैं, राख से रौशनी की तलाश करती हैं, और यादों की उन चौखटों को छूती हैं, जहाँ अतीत आज भी साँस लेता है, और हर याद के साथ दिल फिर से भीग जाता है। "मैं, मुझमें कहीं" उन सबके लिए है, जो कभी-न-कभी खुद से बिछड़े, और फिर खुद तक लौटने की राह तलाशते रहे।

SKU:9789376427130

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