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बस यूँ ही
बस यूँ ही
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जब शब्द अथाह हुए,
मुस्कान ने सुनाई
वो अनकही मन की किताब,
और वही कविता बन गई —
ज़िंदगी|
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रिश्तों की उलझन,
स्त्री मन की अनकही पीड़ा,
जीवन के अनुभवों की गहराई
और संवेदनाओं की सुगंध से सजा
यह काव्य-संग्रह
हर पाठक को
अपने ही जीवन के किसी न किसी पल से
अवश्य जोड़ देगा।
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बस यूँ ही
न कोई शोर,
न कोई दिखावा...
बस जीवन के रंग,
पलों की धूप-छाँव,
रिश्तों की गर्माहट,
यादों की नर्मी
और मन की अनकही अनुभूतियाँ।
इन कविताओं में
जीवन के अनेक रंग हैं—
कहीं मुस्कान, कहीं पीड़ा,
कहीं प्रतीक्षा, कहीं अपनापन।
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आइए...
कुछ पल ठहरिए,
बस यूँ ही पन्ने पलटिए,
और जो शब्द
आपके मन को छू जाएँ,
उन्हें अपना बना लीजिए।
SKU:9789376426423
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