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हवा ही दूषित हैं
हवा ही दूषित हैं
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यह व्यंग्यात्मक काव्य–रचना समाज के चेहरे से नक़ाब उतारने का साहस करती है। यहाँ हर कविता मुस्कान के साथ एक सवाल छोड़ जाती है। व्यवस्था की विडंबनाएँ, आम आदमी की मजबूरियाँ, और आधुनिक दिखावा—सब कुछ तीखे, पर सधे हुए व्यंग्य में पिरोया गया है।
कविताएँ सरल भाषा में लिखी गई हैं, ताकि हर पाठक जुड़ सके। हर रचना पहले मुस्कराती है, फिर चुभती है और अंत में पाठक से सवाल पूछती है। यह किताब गंभीर चेहरों के लिए चेतावनी है और जागते दिमाग़ों के लिए न्योता। अगर आपको हँसते-हँसते सच सहने की आदत है, तो यह संग्रह आपके लिए है।
SKU:9789375271499
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