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तुम अपना ख़याल रखना

तुम अपना ख़याल रखना

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कविता दूर तक जाती है, कभी लौटकर नहीं आती, पर वास्तविकता से टकराकर शब्दों में अपना रास्ता खोज लेती है और बाहर आकर ठहर जाती है। शायद इसी प्रयास में कविता पूर्णता को छूना चाहती है, जबकि सत्य यह है कि कविता कभी पूर्ण नहीं होती— वह सदा सृजन के लिए सजग रहती है।

SKU:9789373147383

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